eGyanvani

Welcome To eGyanvani!

Sanskar An Integral Part of Rajashani Culture

Sanskar An Integral Part of Rajashani Culture

संस्कार : राजस्थानी संस्कृति के अभिन्न अंग

  • सोलह संस्कार
  • विवाह
  • विधवा विवाह
  • स्वच्छता तथा पवित्रता एवं धार्मिक संस्कार
  • मृतक संस्कार
  • अन्य संस्कार

सोलह संस्कार

(1) गर्भधारन संस्कार

(2) पुंसवन

(3) सीमन्तोन्यन

(4) जातकम

(5) नामकरण

(6) निष्क्रमण

(7) अन्नप्राशन

(8) चूड़ाकर्म

(9) कर्णवैध

(10) विद्यारम्भ

(11) उपनयन

(12) वेदारम्भ

(13) केशान्त

(14) समार्वतन

(15)विवाह संस्कार

(16) अन्त्येष्टि संस्कार।

इन संस्कारों का जन्म से मृत्यु तक संस्कारों की व्यवस्था की गई है। ताकि मनुष्य अपने दायित्व के प्रति निरन्तर जागरुक बना रहे। इनकी गतिविधि के साथ यज्ञ, दान व देवगण इस प्रकार संयोजित किए गए हैं कि समाज में आस्था व धर्म पराण्यता का उद्बोधन होता रहे राजस्थानी साहित्य के रुप में इन संस्कारों एवं उनके महत्व के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। संस्कारों, तेरहवीं सदी से लेकर उन्नीसवीं सदी तक राजस्थान के हिन्दू समाज में संस्कारों का महत्व बना रहा। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त तक कई संस्कार प्रचलित थे।

समय-समय पर भी कई राजाओं ने भी कई नियम बनाए, ताकि संस्कारों को बनाए रखा जा सके, इसमें से कुछ संस्कार यथा विवाह एवं मृतक संस्कार धर्म से सम्बन्धित होने के कारण जीवन के अभिन्न अंग थे। कुछ अन्य संस्कार एक लम्बे समय से चले आ रहे थे जैसे नामकरण, अन्न:प्राशन, चूड़कर्म, कर्णवेधन संस्कार, अत: इन संस्कारों को भी धर्म से सम्बन्धित कर दिया गया। विभिन्न सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तनों के कारण इन संस्कारों के स्वरुप में काफी परिवर्तन आ चुका था। जिसके कारण उनका महत्व कम हो गया।

“दस्तूर कौमवार’ से पता चलता है कि कई परिवारों में सीमन्तोन्थन संस्कार इसलिए सम्पादित किया जाता था ताकि गर्भ स्थित भ्रूण की रक्षा के लिए देवताओं की कृपा प्राप्त की जा सके। इसी प्रकार कई परिवारों में “जातकर्म’ एवं “सूतिका स्नान संस्कार’ भी बड़े धूमधाम से मनाये जाते थे। नामकरण संस्कार के समय ज्योतिषि जन्मपत्री तैयार करता था व ब्राह्मणों को दान दिक्षा दी जाती थी। अन्नप्राशन एवं चूड़ाकर्म संस्कारों को सम्पादित करते समय काफी धन खर्च किया जाता था। परन्तु सबसे अधिक धन उनपयन संस्कार पर खर्च होता था। इस अवसर पर प्रतिष्ठित नागरिकों को वस्र एवं आभूषण आदि देने की प्रथा थी, परन्तु सामान्य जनता के पास आवश्यक धन व्यय करने के लिए नहीं था अत: वह इन संस्कारों को विधिपूर्वक नहीं मना सकते थे।

विवाह

हिन्दू समाज में विवाह संस्कार एक सामाजिक दायित्व और धार्मिक दायित्व समझा जाता था। विवाह के लिए आयु की सीमा निश्चित नहीं थी। विवाह से पूर्व सगाई की रस्म अदा की जाती थी। जब सगाई की रस्म अदा होती थी तब लड़की का पिता लड़के के लिए कपड़े, आभूषण, मिठाई एवं नारियल आदि भेजता था। विवाह का दिन निश्चित हो जाने से बारात की विदाई तक के अलग-अलग जातियों में विविध रीति रिवाज प्रचलित थे।

प्रत्येक परिवार में प्रतिष्ठा के अनुसार विवाह के समय “बड़ी पलड़ा’ एवं “दहेज’ देता था। वर पक्ष का पिता वधू के लिए आभूषण एवं वस्र भेजता था। उसे बरी कहते थे, इनके साथ मिठाई व सुगन्धित वस्तुएं भी भेजी जाती थी। जिन्हें “पड़ला’ कहते थे। लड़की का पिता अपनी लड़की को जो सामान देता थो उसे दहेज कहा जाता था। “बरी पड़ले’  में चूड़ा और चूंदड़ी का होना जरुरी समझा जाता था। क्योंकि न दोनों को सुहाग का प्रतीक समझा जाता था।

विधवा विवाह

ब्राह्मण,  उच्च राजपूत, महाजन, ढोली, चूड़ीगर तथा सांसी जातियों में विधवा विवाह वर्जित था। अन्य जातियों में विधवा विवाह प्रचलित थे। विधवा विवाह को “नाता’ के नाम से पुकारा जाता था।

स्वच्छता तथा पवित्रता एवं धार्मिक संस्कार

विवाह संस्कार के अतिरिक्त अगरणी या पुसवंन संस्कार भी सम्पादित किया जाता था। यह संस्कार महिला को गर्भावस्था के समय सम्पन्न होता था। जब स्री पहली बार गर्भवती होती थी, तब गर्भ धारण के सातवें माह या उसके बाद उस स्री के आंचल में चावल, नारियल तथा गुड़ भरकर पीहर (मायके) भेज दिया जाता था, ताकि वो अपनी पहली संतान को वहां पर जन्म दे सके। अन्य हिन्दुओं की भांति विधवाओं को यथा सम्भव हर शुभ कार्य से दूर रखा जाता था।

जब महिला लड़के को जन्म देती थी, तब थाली बजाकर सूचना दी जाती थी और लड़की के जन्म पर सूपड़ा पीट कर सूचना दी जाती थी। दस दिन तक “सुवावड़ी’ नव प्रसुता को अपवित्र माना जाता था, डेढ़ माह बाद सूरज पूजा होने के बाद ही महिला दैव कार्यों में भाग ले सकती थी। तत्पश्चात बच्चे का होली पर “ढूंढ’ और बाद में मुण्डन संस्कार तक सारी क्रियाएं उस समय के हिन्दू समाज में मुख्य रुप से प्रचलित थी। रजस्वला स्री चूल्हा-चौका या दैव पूजा नहीं कर सकती थी। उसका स्पर्श दोष माना जाता था, इसके अतिरिक्त वह सारे कार्य सम्पादित कर सकती थी।

मृतक संस्कार

हिन्दू संस्कारों में मृतक संस्कार का भी अपना विशिष्ट महत्व है, यद्यपि अलग-अलग रीति-रिवाज प्रचलित थे। तथापि बुनियादी बातों में एक रुपता कायम रही। मृतक संस्कारों के भी दो रिवाजों का उल्लेख राजस्थान में मिलता है जो आज भी प्रचलित हैं, एक “भदर’ एवं दूसरा मृतक भोज।

लगभग समस्त हिन्दू जातियों में बड़े-बूड़ों की मृत्यु हो जाने पर उसके परिवार के पुरुष सम्बंधियों एवं रिश्तेदारों के लिए सर के बाल एवं दाड़ी-मूंछ का मुंडन करवाना आवश्यक था। इसे “भदर’ कहते थे। जब किसी शासक की मृत्यु हो जाती थी तो ईसाई, सिक्ख, मुसलमान आदि जातियों का “भदर’ होना पड़ता था। इस सम्बन्ध में बकायदा राजकीय आदेश जारी किए जाते थे।

राजस्थान के हिन्दू समाज में प्रौढ़ तथा वृद्धों की मृत्यु हो जाने पर मृतक भोजन का आयोजन करना उसके परिवार के लिए जरुरी था। यह मृत्यु भोज महारोग के समान व्यापक था।

निर्धन लोग कर्जा लेकर मृतक भोज का आयोजन किया करते थे। वे जीवन भर उस कर्ज को चुकाया करते थे, कर्ज चुकाते ही उनकी मृत्यु हो जाती थी। सम्पन्न लोग इस अवसर पर पानी की तरह पैसा खर्च करते थे। उदाहरणत: स्वरुप मेहता सायब चंद ने अपने पिता के मृतक भोज में 52 गांवों के महाजनों को भोजन करने हेतु आमंत्रित किया। तत्कालीन ऐतिहासिक साधनों से इस बात की पुष्टि होती है कि विभिन्न राज्यों में प्रतिष्ठित नागरिकों तथा जागीरदारों को मृतक भोज के समय सरकार उन्हें अनुदार देती थी।

अन्य संस्कार

जब बच्चा माता के गर्भ में होता है तो हवन द्वारा जिस संस्कार को सम्पादित किया जाता है उसे “”सीमान्तोनयन संस्कार” कहते हैं।

गुरुकुल गमन संस्कार, उपनयन से सम्पन्न करने का विधान मिलता है। विवाह संस्कार के समय गणेश पूजा, नात्रिका पूजन, हवन एवं सन्तदी आदि क्रियाएं सम्पादित की जाती हैं। इस समय अनेक रीति-रिवाज भी सम्पन्न किए जाते थे, जो राजस्थान की अनूठी विशेषता है। उदाहरण स्वरुप टीका, मिलणी, पीठी बाजोर, बिठावन फेरा एवं सीख आदि रस्में अपने आप अद्वितीय हैं जाति-पांति में इनको विधिवत् मनाया जाता है। सभी जातियों में मिलणी, वर तथा वधू को उबटन लगाया जाता है। समृद्ध परिवार दहेज में अपार धन राशि खर्च करते हैं। इसी प्रकार अन्त्येष्टि की प्रक्रिया में शास्री पद्धति राजस्थान में खूब निभायी जाती रही है। वर तथा वधू के स्वागत सम्बन्धी लोक गीत बहुत मार्मिक होते हैं, जिनमें राजस्थान की संस्कृति स्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर होती है। इनमें दोनों की दीर्घायु की कामना होती है। इनके अतिरिक्त प्राचीन कालीन सभ्यता के अनुरुप उन्हें शिक्षा भी दी जाती है।

Read also about Rajasthan River, Lake of Rajasthan, Jaipur States Coin.

Leave a Comment

Your email address will not be published.

error: Content is protected !!